मेरे बारे में .............
- Bahaar Bareilvi
- Bareilly, Uttar Pradesh, India
- नाम: एम्. रबीअ 'बहार' सम्प्रति: शिक्षक (बेसिक शिक्षा विभाग, उ प्र.) पत्रकारिता व मल्टीमीडिया शिक्षक, स्वतन्त्र पत्रकारिता।
Saturday, February 16, 2008
मुझ को उस की याद न आए ,नामुमकिन /
ज़ख्म-दिल यूं ही भर जाए, नामुमकिन/
पत्थर आइना बन जाए मुमकिन है/
उस की सख्त मिजाजी जाए, नामुमकिन /
ईसा की सूली,सुकरात के प्याले का /
खौफ मुझे हक से भटकाए, नामुमकिन/
टूटा दिल लेकर बाज़ार में आ बैठे /
कोई इस के दाम लगाए, नामुमकिन/
रबीअ बहार
Friday, February 1, 2008
एक संजीदा तबियत को हँसाने के लिए
मुस्कुरा भी दो किसी के मुस्कुराने के लिए
आप खंज़र तोलिए गर्दन उडाने के लिए
दिल की रग-रग है परेशां खूँ बहाने के लिए
इत्तेफकन आ गयी थी मेरे होंठों पे हँसी
एक ज़माना चाहिऐ फिर मुस्कुराने के लिए
दोस्ती ही खूने नाहक के लिए काफी नहीं
आस्तीं भी चाहिऐ खंज़र छुपाने के लिए
दिल में गुनज़ायिश हो तो दुनिया सिमट आये मगर
दिल में गुन्ज़ायिश भी है ? दुनिया बसाने के लिए
दौर-ए-हाजिर में तो कुछ चेहरों पे शादाबी भी है
लोग तरसेंगे कभी खुशियाँ मनाने के लिए/
दिलकश आफरीदी बदायुनी
Saturday, January 26, 2008
इश्क की बेखुदी में
आज काग़ज़ पे उनको खुदा लिख गयी
दिल के मंदिर में उस बुत को बैठा दिया
और दर पर उसे देवता लिख गयी
इश्क के सौदे में इक मुस्तकिल दर्द है
ऐसे घाटे को मैं फायदा लिख गयी
नाज़ लफ्जों में सूरत वो थी ढालना
लफ्ज़ खुशबू से बाद-ए-सबा लिख गयी
नाज़ बरेलवी
Friday, January 25, 2008
चंद क़तात -रबी बहार
मजनू होना भी मुश्किल है लैला भी आसान नहीं है/
प्यार में दीवाने होते थे वह दौर-ए-जीशान नहीं है/
प्यार भी अब तो सोच समझकर साजिश जैसा होता है /
लफ्ज़ -ए-मुहब्बत के मानों में पहले जैसी जान नहीं है /
अंदाज़-ए-अदावत भी जुदा लगता है /
ज़हर भी इस तरह देते हैं दवा लगता है/
अब मुहब्बत भी सियासत की तरह होती है/
बेवफा यार भी अब जान-ए-वफ़ा लगता है/
शम्स को आइना दिखाता हूँ/
बर्फ की मूरतें बनाता हूँ /
इससे मेरा है खून का रिश्ता /
मैं ग़ज़ल को लहू पिलाता हूँ/
फिक्र छोड़ दे प्यारे होगा जो भी होना है /
आदमी अजल से ही वक़्त का खिलोना है /
दोलतें अमीरों की हैं इन्हीं से बावस्ता /
जिनकी आसमान चादर और ज़मीं बिछौना है /
प्यार जब कर गया असर चुपचाप /
हो गयी सब को फिर खबर चुपचाप /
आइनों में शुमार है अपना /
हम भी कहते हैं सच मगर चुपचाप /
एक भी राज़ दोस्तों पे न खोल /
ये लगा देंगे एक सिफर चुपचाप /
रंग -ओ- निकहत गुलाब जैसी है /
उस की मस्ती शराब जैसी है /
जी में आता है चूम लूं उस को /
वो मुक़द्दस किताब जैसी है /
खुद आईना हो जाऊंगा
उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊंगा
तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा ही नहीं
मैं गिरा तो मसला बन कर खडा हो जाऊंगा
मुझ को चलाने दो, अकेला है अभी मेरा सफर
रास्ता रोका गया तो काफिला हो जाऊंगा
दुनिया कि नज़र में है मेरा अहद-ए- वफ़ा
एक तेरे कहने से क्या मैं बेवफा हो जाऊंगा
वसीम बरेलवी